के. के. गुप्ता उदयपुर...गुप्ता कंट्रक्शन मंदसौर और सिस्टम के सामंजस्य से लिखी जा रही घटिया निर्माण की इबारत....सौ करोड़ से अधिक की लागत वाले भाटखेड़ा-डूंगलावदा "सिटी फोरलेन" की गुणवत्ता पर उठे सवाल...विकास के नाम पर सरकारी धन का विनाश..मापदंडों के विपरीत तैयार हो रहा फोरलेन, चढ़ा भ्रष्टाचार की भेंट....
नीमच//तकरीबन सौ करोड़ से अधिक की भारी भरकम राशि से तैयार हो रहा भाटखेड़ा डूंगलावदा सिटी फोरलेन गुणवत्ता से जुड़े मापदंडों के विपरीत निर्माण के चलते विवादों में घिर चुका है, नीमच में विकास की एक नई इबारत लिखने जा रही सिटी फोरलेन जैसी महत्वाकांक्षी योजना को सरेराह किस तरह पलीता लगाया जा रहा है, इसकी बानगी निर्माण कार्य में ही देखने को मिल रही है, जहां घटिया किस्म की प्रतिबंधित सफेद गिट्टी का उपयोग इस प्रोजेक्ट में किया जा रहा है, जबकि आम तौर पर सड़क निर्माण कार्यों में काली गिट्टी का उपयोग अधिक प्रभावी और टिकाऊ माना जाता है, वहीं इसकी तुलना में सफेद गिट्टी अनुपयोगी होने के साथ निर्माण को घटिया किस्म का बनाती है... लेकिन सभी मापदंडों को दरकिनार करते हुए, फोरलेन निर्माण कर रही उदयपुर की के के जी प्रा लि कम्पनी ने मध्यप्रदेश सरकार की एक बड़ी धन राशि को
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया है...
खास बात यह है कि नीमच शहर के विकास से जुड़े इस बड़े और महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को पूर्ण करने का जिम्मा यानि कि"ठेका" उदयपुर की केके गुप्ता प्रा. लि. को दिया गया है...वहीं सिटी फोरलेन निर्माण के पृथक-पृथक कार्य के लिए इसका पेटी कॉन्ट्रैक्ट मंदसौर की गुप्ता कंट्रक्शन के पास है...और मतलब भी साफ है कि सिस्टम के अंदर और बाहर "गुप्ता" जी का ही बोलबाला है...जहां विकास के नाम पर सरकारी धन का विनाश होते नीमच में बन रहे सिटी फोरलेन के घटिया निर्माण के रूप में देखा जा सकता है...?
बतादें कि हाइवे निर्माण कार्यों में में सफेद गिट्टी को प्रतिबंधित किया गया है, क्योंकि यह सडक के लिए उपयुक नहीं है, वहीं काली गिट्टी की तुलना में यह ज्यादा घिसती है, और भारी वाहनों के कारण सड़क क्षतिग्रस्त भी होती है, और अधिक धूल उड़ती है, जिससे सडक जल्दी खराब हो जाती है। सड़क की गुणवता और टिकाऊपन: "डामर की सड़कों के लिए" काली गिट्टी बेहतर होती है, क्योंकि यह कम घिसती है और भारी ट्रैफिक को बेहतर ढंग से सहन कर सकती है। वहीं सफेद गिट्टी के इस्तेमाल से सडक जल्दी उखड़ भी जाती है, और इसके साथ ही धूल भी उड़ती है, जिससे कि पदूषण बढ़ता है। वहीं इसके उपयोग से खराब होने वाली सड़कों को बार-बार मरमत की आवशयकता होती है, जो सडक की टिकाऊपन और गुणवता पर बुरा असर डालता है।
अब ऐसे में सौ करोड़ से भी अधिक की लागत वाला सरकारी विकास भी यदि टिकाऊ न हो तो ये सिस्टम पर सवाल तो खड़े करेगा ही...साथ ही संबंधित कंट्रक्शन कम्पनी की उस एप्रोच को भी जगजाहिर करता है, जिसके दम पर कंपनी के कर्ता-धर्ता खुलेआम सिटी फोरलेन को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाने को आमदा है...!