नीमच में आदिवासी भूमि हस्तांतरण पर सवाल, विधायक परिवार को सात दिवस में कैसे मिली अनुमति......जनता ने दिया आशीर्वाद...सहानुभूति ने बनाया विधायक अब आदिवासी की जमीन को लेकर छिड़ गया विवाद.....
वो पहले साधारण थे...फिर राजनीति में कदम रखा तो असाधारण बने...जनता की तकलीफों को समझा जाना और इसी जनसेवा का प्रतिफल उन्हें सहानुभूति के रूप चुनावों में मिला...जनता ने आशीर्वाद दिया और विधायक भी बनाया...निरंतर प्रदेश की सत्ता में अपना जनप्रतिधि चुनकर भेजा...लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि सत्ता का नशा चढ़ने में भी देर नहीं लगती.....फिर चाहे कोई साधारण व्यक्तित्व से जुड़ा नेता ही क्यों न हो.....कुर्सी मिलते ही पद के पॉवर से अपने हित साधना हर किसी की लालसा बन जाती है, कुछ ऐसा ही घटनाक्रम सामने आया है, मध्यप्रदेश की नीमच विधानसभा में जहां विधायक दिलीप सिंह परिहार पर आदिवासी की जमीन के हस्तांतरण को लेकर विवाद खड़ा हो गया है...!
दरहसल जिले में आदिवासी भूमि के हस्तांतरण को लेकर एक मामला चर्चा में है। आरोप है कि ग्राम बरखेड़ा हाड़ा, पटवारी हल्का चम्पी, तहसील एवं जिला नीमच स्थित अनुसूचित जनजाति वर्ग की भूमि को भाजपा विधायक दिलीपसिंह परिहार के पुत्र यशराजसिंह एवं पुत्री हर्षना परिहार के नाम विक्रय की अनुमति महज़ सात दिनों में प्रदान कर दी गई। पूरे घटनाक्रम की रफ्तार को लेकर प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
प्रकरण का क्रमवार विवरण
दस्तावेजों के अनुसार 14 दिसंबर 2020 को आदिवासी कृषक लालुराम पिता हजारी भील एवं प्रेमबाई पति लालुराम भील की अहस्तांतरणीय भूमि के विक्रय हेतु अनुबंध किया गया। यह भूमि सर्वे क्रमांक 181 रकबा 0.09 हेक्टेयर एवं 186/1 रकबा 0.3400 हेक्टेयर, कुल 0.430 हेक्टेयर बताई गई है।
बताया जा रहा है कि फाइल एसडीएम कार्यालय से होते हुए तहसील कार्यालय पहुँची, जहाँ 21 दिसंबर 2020 को एक ही दिन में पटवारी रिपोर्ट, उप-पंजीयक (सब रजिस्ट्रार) की रिपोर्ट तथा विज्ञप्ति जारी होने की प्रक्रिया पूर्ण कर ली गई। सामान्यतः ऐसी विज्ञप्तियों पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए निर्धारित समयावधि 15 दिन मानी जाती है, लेकिन इस प्रकरण में आपत्ति न आने का उल्लेख करते हुए फाइल शीघ्र ही आगे बढ़ा दी गई।
22 दिसंबर 2020 को फाइल पुनः एसडीएम कार्यालय पहुँची और उसी दिन कलेक्टर कार्यालय अग्रेषित कर दी गई। 23 दिसंबर 2020 को कलेक्टर, नीमच द्वारा विक्रय की अनुमति आदेश जारी कर दिया गया। इसके बाद पंजीयन प्रक्रिया भी पूर्ण कर ली गई।
उठ रहे सवाल.....?
क्या अनुसूचित जनजाति की भूमि के हस्तांतरण में निर्धारित प्रक्रिया और समयसीमा का पूर्ण पालन हुआ?
विज्ञप्ति अवधि और आपत्ति निवारण प्रक्रिया क्या नियमानुसार पूरी की गई? क्या सामान्य आवेदकों के मामलों में भी इतनी त्वरित कार्यवाही संभव है...तमाम ऐसे सवाल है, जो विधायक दिलीप सिंह के जमीन हस्तांतरण मामले में उठ रहे है... और जिम्मेदारों कि और से इसका स्पष्टीकरण आना अब तक शेष है...!
जानकारी के मुताबिक मध्यप्रदेश में अनुसूचित जनजाति वर्ग की भूमि के हस्तांतरण पर विशेष प्रतिबंध लागू होते हैं। सामान्यतः कलेक्टर की पूर्व अनुमति आवश्यक होती है तथा यह सुनिश्चित किया जाता है कि लेन-देन से मूल भूमि स्वामी के अधिकार प्रभावित न हों।
फिलहाल आदिवासी की भूमि पर बना विधायक जी का पेट्रोल पंप विधानसभा से लेकर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है, और इस मामले को लेकर बहस भी छिड़ी हुई है...!