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"विधानसभा में भ्रष्टाचार की गूँज... और ज़मीन पर 'एल्डरमैन' का इनाम!" "भ्रष्टाचार का मामला कहाँ गया? शायद 'उपहारों' के नीचे दब गया। " रामपुरा की जनता देख रही है... वाह विधायक जी, क्या न्याय है...!

रामपुरा। राजनीति में कब कौन किसका 'खास' बन जाए और कब जांच की फाइलें 'उपहारों' के नीचे दब जाएं, यह रामपुरा नगर पंचायत के ताजा घटनाक्रम से बेहतर कहीं नहीं समझा जा सकता। रामपुर के पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष गोविंद सोनी एक बार फिर चर्चाओं के केंद्र में हैं, लेकिन इस बार वजह विकास नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच मिला 'एल्डरमैन' का पद है।

लोकायुक्त की जांच और विधानसभा का सवाल...

गौरतलब है कि गोविंद सोनी पर पूर्व अध्यक्ष यशवंत करेल और उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के भाई मुरली देवड़ा ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हुए साक्ष्य लोकायुक्त को सौंपे थे। लोकायुक्त इस मामले में संज्ञान लेकर कार्यवाही कर ही रहा था कि यह मुद्दा विधानसभा में मनासा विधायक अनिरुद्ध माधव मारू ने भी पूरी प्रखरता से उठाया। लेकिन सवाल यह है कि जिस मामले की गूँज सदन में सुनाई दी, वह धरातल पर आते-आते खामोश क्यों हो गई?

निष्ठावानों को दरकिनार कर 'खास' पर मेहरबानी...?

गोविंद सोनी कभी पूर्व विधायक कैलाश चावला के सिपहसालार हुआ करते थे, लेकिन विधानसभा में घिरने के बाद समीकरण बदले और वे मौजूदा विधायक मारू के खेमे में नजर आने लगे। जनता के बीच यह चर्चा आम है कि क्या भ्रष्टाचार के आरोपों की धार कुंद करने के लिए यह 'पाला बदल' किया गया?
सबसे बड़ा सवाल संगठन की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहा है। क्या भाजपा के पास रामपुरा में निष्ठावान कार्यकर्ताओं का अकाल पड़ गया था? नगर पंचायत के पूर्व मंडल अध्यक्ष और पूर्व पार्षद राकेश जैन जैसे जमीन से जुड़े नेताओं, जिन्होंने संगठन को सींचने में अपना जीवन लगा दिया, उन्हें दरकिनार करना कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष पैदा कर रहा है। चर्चा है कि यदि राकेश जैन जैसे बेदाग चेहरों को तवज्जो दी जाती, तो क्षेत्र में विधायक और पार्टी दोनों का वर्चस्व बढ़ता।

जनता की अदालत में 'न्याय' पर सवाल....

भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे व्यक्ति को एल्डरमैन नियुक्त करना रामपुरा की जनता के गले नहीं उतर रहा है। लोग तंज कस रहे हैं कि "भ्रष्टाचार का मामला कहाँ गया? शायद 'उपहारों' के नीचे दब गया। "लोकायुक्त की कार्यवाही के बीच इस नियुक्ति ने न केवल जांच की निष्पक्षता पर संदेह पैदा किया है, बल्कि भाजपा के 'जीरो टॉलरेंस' के नारे पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। अब देखना यह है कि 'उपहार' में मिले इस पद के बाद लोकायुक्त की फाइलें आगे बढ़ती हैं या रसूख के रद्दीखाने में दफन हो जाती हैं।
रामपुरा की जनता सब देख रही है... और विधानसभा से लेकर सड़क तक सन्नाटा बहुत कुछ कह रहा है!

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