सियासी हलचल सम्राट दीक्षित के भाजपा प्रवेश से क्या दोहराया जाएगा इतिहास? 'जाजम' बड़ी करने की नसीहत और कार्यकर्ताओं की टीस के बीच फंसी भाजपा....!
रामपुरा//नगर की राजनीति में दशकों बाद एक बार फिर वैसा ही दृश्य देखने को मिला, जिसने पुराने भाजपाइयों के जख्मों को हरा कर दिया है। कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे स्वर्गीय सुरेश प्रसाद दीक्षित के पुत्र सम्राट दीक्षित के भाजपा में शामिल होने के बाद क्षेत्र का सियासी पारा चढ़ गया है। इस घटनाक्रम ने न केवल 1990 के दौर की यादें ताजा कर दी हैं, बल्कि वर्तमान विधायक माधव मारू के इस निर्णय पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
इतिहास की पुनरावृत्ति: पटवा जी की वह 'बड़ी जाजम' और बगावत....
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है। 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने सुरेश प्रसाद दीक्षित को भाजपा की सदस्यता दिलाई थी। उस समय भाजपा के पितृ पुरुष शांतिलाल जैन ने इसका कड़ा विरोध किया था। तब पटवा जी ने रामपुरा की सभा में मंच से कहा था— "शांतिलाल, जाजम को बड़ी करो और अपने मन को भी बड़ा करो, अब भाजपा बड़ी हो गई है।"लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुरेश प्रसाद दीक्षित चुनाव से ठीक पहले पुनः कांग्रेस में शामिल हो गए, जिसका खामियाजा सुंदरलाल पटवा के भतीजे मंगल पटवा को हार के रूप में भुगतना पड़ा था। आज वही स्थिति सम्राट दीक्षित के प्रवेश पर दिख रही है।
विधायक मारू का दांव या पुरानी गलती का दोहराव....?
चर्चा है कि विधायक माधव मारू ने इतिहास से सबक लेने के बजाय उसी जोखिम भरे रास्ते को चुना है। कार्यक्रम के दौरान जब विधायक ने पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष राकेश जैन से पूछा कि "आपको कोई आपत्ति तो नहीं है?" तो जैन की चुप्पी ने बहुत कुछ कह दिया। यह मौन स्वीकृति थी या आने वाले तूफान से पहले की शांति, यह भविष्य तय करेगा।
कोर वोट बैंक में नाराजगी भाजपा के लिए खतरे की घंटी....
सम्राट दीक्षित के भाजपा में आने से पार्टी का 'कोर वोट बैंक'— काछी, गायरी और भोई समाज— खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है। यह वर्ग पारंपरिक रूप से दीक्षित परिवार का राजनीतिक विरोधी रहा है। कार्यकर्ताओं में दबी जुबान में चर्चा है कि बाहरी नेताओं को तवज्जो देने से पार्टी के निष्ठावान कैडर में बिखराव हो सकता है, जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिलने की उम्मीद है।
भविष्य के गर्भ में सवाल ....
क्या भाजपा का स्थानीय संगठन और कार्यकर्ता सम्राट दीक्षित को पूरी तरह स्वीकार कर पाएंगे? या फिर सम्राट भी अपने पिता की राह पर चलते हुए ऐन वक्त पर 'घर वापसी' करेंगे? रामपुरा की जनता और भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता आज इसी उधेड़बुन में है।यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि विधायक मारू की यह 'बड़ी जाजम' भाजपा को मजबूती देगी या फिर 1990 की तरह हार का कड़वा घूंट पिलाएगी।