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वायरल ऑडियो, अधूरी जानकारी और टीआरपी की दौड़, आखिर तथ्यहीन खबरों से कब बचेगी पत्रकारिता?... मनासा विधायक से जुड़े कथित वायरल ऑडियो पर सोशल मीडिया में मचा बवाल, बिना पुष्टि वीडियो प्रसारित करने पर उठे सवाल...

नीमच/ कांग्रेस नेता राहुल गांधी के कथित विवादित बयान को लेकर मनासा विधायक अनिरुद्ध माधव मारू द्वारा मनासा थाने में सूचना पत्र दिए जाने के बाद जिले की राजनीति गरमा गई है। एक ओर कांग्रेस इस कार्रवाई का लगातार विरोध कर रही है, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया पर कई प्रकार की पोस्ट और वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं। इसी बीच एक फेसबुक पेज पर साझा किए गए कथित ऑडियो वीडियो को लेकर पत्रकारिता की विश्वसनीयता और तथ्यों की पुष्टि को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दरअसल, सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से प्रसारित किया गया, जिसमें मनासा विधायक अनिरुद्ध माधव मारू से जुड़ा कथित ऑडियो जोड़कर कई दावे किए गए। वीडियो में यह तक कहा गया कि वर्ष 2023 में उन्हें टिकट नहीं मिला, जबकि वर्तमान स्थिति में वे विधायक हैं। इतना ही नहीं, वीडियो में मनासा को “मनसा” कहकर संबोधित किया गया और कई ऐसी बातें प्रस्तुत की गईं जिनका कोई स्पष्ट तथ्यात्मक आधार दिखाई नहीं देता। जानकारी के अनुसार वायरल किया जा रहा यह कथित ऑडियो पुराना बताया जा रहा है। कुछ लोग इसे वर्ष 2023 का बता रहे हैं तो कुछ इसे 2018 के आसपास का मान रहे हैं। हालांकि, इस ऑडियो की आधिकारिक पुष्टि किसी भी स्तर पर नहीं हुई है। ऐसे में बिना सत्यापन किसी ऑडियो या वीडियो को तोड़-मरोड़कर वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़ना पत्रकारिता की मूल भावना पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। राजनीतिक विवादों के बीच कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विधायक माधव मारू के विरोध में पुतला दहन भी किया और कई आरोप लगाए। लेकिन इसके समानांतर सोशल मीडिया पर चल रहे कथित वीडियो और पोस्ट ने माहौल को और अधिक भ्रमित करने का काम किया है। खास बात यह है कि कुछ प्लेटफॉर्म्स पर इस वीडियो को समाचार के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि उसमें दिखाई गई जानकारियों की पुष्टि नहीं की गई थी। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, जहां किसी भी सूचना को प्रकाशित या प्रसारित करने से पहले तथ्यों की जांच सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। सोशल मीडिया के इस दौर में फर्जी या अपुष्ट खबरें तेजी से फैलती हैं और कई बार जनमानस को गुमराह भी करती हैं। ऐसे में केवल वायरल कंटेंट के आधार पर समाचार प्रस्तुत करना न केवल गैर-जिम्मेदाराना माना जाता है, बल्कि इससे मीडिया की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। राजनीतिक दलों के समर्थकों द्वारा संचालित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी संयम और जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए। क्योंकि किसी भी प्रकार की भ्रामक या अपुष्ट सामग्री केवल विरोधी पक्ष ही नहीं, बल्कि स्वयं संबंधित दल की छवि को भी नुकसान पहुंचा सकती है।फिलहाल यह पूरा मामला जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। वहीं जागरूक नागरिकों का मानना है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अपनी जगह है, लेकिन पत्रकारिता और सोशल मीडिया संचालन में तथ्यों की पुष्टि, निष्पक्षता और जिम्मेदारी सबसे ऊपर होनी चाहिए.....

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